Thursday, 19 January 2017
Friday, 13 January 2017
सूरज डूबा समंदर में (Fun Fantasy Song)
सूरज डूबा समंदर में
खाने को मछलियाँ
छोटी-बड़ी, रंग-बिरंगी,
खूबसूरत सी मछलियाँ
उसे लगती थी स्वादिष्ट
जिस समुद्र की ये मछलियाँ
उसी समुद्र से छुप-छुप के
खाता था वह मछलियाँ
एक दिन_
एक दिन उसने एक मछली खा ली
जो कि थी एक शार्क की घरवाली
देखा यह जब शार्क ने
तो वह गुस्से से उबला
और उसने शपथ ली
कि लेके रहेगा बदला
मछलियाँ खाने जब सूरज
अगली रोज़ रात को आया
तो शार्क ने एक ख़ूबसूरत सी
गोल-मटोल मछली का जाल बिछाया
मछली को देख सूरज ललचाया
देखा जिसे समुद्र ने
और उसको कैदी बनाया
दो दिन तक जब सूरज वापस नही आया
तो बादलों ने उसका पता लगवाया
कि किसने सूरज को किडनैप करवाया
तब उन्हें चाँद ने बताई ये बात
कि समुद्र ने बनाया सूरज को कैदी
और मारी मारी दो लात
क्यूंकि वह तो डूबा था समंदर में
खाने को मछलियाँ
छोटी-मोटी, रंग-बिरंगी
खूबसूरत सी मछलियाँ
पाकर पता सूरज का
ज़ोर-ज़ोर से गरज़े और बरसे बादल
और गिराई समंदर पर बिजलियाँ
कि सूरज को क्यूँ तुमने किडनैप किया?
वह तो है इस दुनिया का इकलौता दीया
बोला समुद्र
सूरज ने खाई मेरी मछलियाँ
बुझा दूंगा मैं तुम्हारा
वह रौशनी का दीया
फिर कोई हिम्मत नहीं करेगा
खाने की मेरी मछलियाँ
सीधी-सादी, खूबसूरत सी
प्यारी-प्यारी मछलियाँ
बोले बादल हो गई है गलती उससे
दे दो उसको माफ़ी
रोज़ रात को बना लेना कैदी
क्या इतना नहीं है काफी?
बादलों की विनती पर
समंदर का मन पिघला
और तीसरे दिन सूरज
फिर से निकला
बदहज़मी कर गई उसको खाना मछलियाँ
समुद्र का कैदी है वह इकलौता दीया
जहाँ उसे ठंडी बर्फ चलाती है गुदगुदियाँ
अब भूल चूका है वह खाना मछलियाँ
जान से ज्यादा ख़तरनाक़ साबित हो गई
उसको वह ख़ूबसूरत सी स्वादिष्ट मछलियाँ _ _!
-निकिता पोरवाल (iCosmicDust)
Thursday, 12 January 2017
Moon on Holiday (Fun Fantasy song)
अपनी Daily की Duty से ऊबकर
आज़ चाँद निकला है Holiday पर
अपने सारे कपड़े_ अपने 16 जोड़ी कपड़े Pack कर
आज़ चाँद निकला है Holiday पर
वह ये नौकरी करता था
क्योंकि वो पृथ्वी पर मरता था
लेकिन_इतने सारे चक्कर खाकर
भी चला ना जब कोई चक्कर
तो वह चूर-चूर हो गया थककर
अब आने लगे उसे चक्कर पे चक्कर
तब चाँद निकला है Holiday पर
उसने सोचा नौकरी छोड़ Universe Tour पर जाऊँगा
और पृथ्वी से ज्यादा सुन्दर ग्रहों से अपना चक्कर चलाऊंगा
दिखाऊंगा अपने अलग-अलग रूप और लड़ाउंगा उनसे नैन
जिससे वो सब हो जाएंगी मेरी Fan
फिर वो सब मिलकर लगाएंगी मेरे चक्कर
आज़ चाँद निकल चुका है Holiday पर
घुमा उसने पूरा ब्रह्माण्ड बनकर रंगीला
कई तारों, ग्रहों,मंदाकिनियों व उल्काओं से भी मिला
बाल-बाल बचा जब निगलने वाला था Black Hole
लेकिन उसकी Body में हो गए छोटे-छोटे Hole
वो चूर-चूर हो गया थककर
और खाने लगा चक्कर के अंदर चक्कर
चाँद जो निकला था Holiday पर
आगे चलकर उसको मिले चार Pirate Comet
जिन्होंने उसे नचाया जैसे कि हो Puppet
फ़िर खेला उसको निशाना बनाकर तीरंदाज़ी का ख़ेल
और डाल दी उसकी नाक में नकेल
लूट लिया उसको पूरा बेहाल कर
जैसे निकला हो वह Holiday नहीं बल्कि संन्यास पर
चाँद जो निकला था Holiday पर
आ गया याद उसको अब अपना घर
अब उसे पता चला कि वो था कितना Fool
नहीं है इस Universe में पृथ्वी जैसी Beautiful
आ गया लौटकर पसीने से तरबतर
चाँद जो निकला था Holiday पर
अपनी पुरानी Duty फिर से Join कर
रिझाने लगा पृथ्वी को वो घनचक्कर
और दोबारा लगाने लगा चक्कर पे चक्कर
और भी सुन्दर-सुन्दर कपड़े पहनकर_ _!
-निकिता पोरवाल (iCosmicDust )
Wednesday, 11 January 2017
Black Scientist Bat (Fun Fantasy Song)
Prolouge:
Since this a fantasy song, the Bat in this song is a scientist and his home looks like a tiny pea which actually justify the concept of bigger inside..! so please read this song as a child imagination with not any kind of logic. HAVE FUN..!!
Since this a fantasy song, the Bat in this song is a scientist and his home looks like a tiny pea which actually justify the concept of bigger inside..! so please read this song as a child imagination with not any kind of logic. HAVE FUN..!!
मटर के अंदर चमगादड़ का घर
जिसको खा गया एक कबूतर
मटर के अंदर चमगादड़ का घर
जिसको खा गया एक कबूतर
शाम को आया जब चमगादड़ लौटकर
नहीं मिला कही भी उसको अपना घर
घर को ढूंढता रहा रात भर
तब टिड्डा उससे बोला, मत भटक दर-ब-दर
तेरे घर को खा गया कबूतर
जो सोया है सामने वाले पेड़ पर
जब तक चमगादड़ पहुँचा वहाँ पर
तब तक कबूतर हो चुका था रफ़ुचक्कर
क्योंकि वो तो निकला था World Tour पर
मटर के अंदर चमगादड़ का घर
जिसको खा गया एक कबूतर
कबूतर ने गिराया समंदर पर वो मटर
जिससे हो गया पूरा काला समंदर
उधर चमगादड़ उसे ढूंढ-ढूंढ कर परेशान
पर नहीं मिला उसको कोई नामोनिशान
तब उल्लू उससे बोला, क्यूँ होता है परेशान?
इतनी देर में मिल जाएगा दूसरा मकान
चमगादड़ बोला, अबे उल्लू, घर की किसको पड़ी है?
उसके अंदर रह गई Black Ink की पुड़ी है
जो कि अगर खुल गई तो आ जाएगा कहर
मैंने किया था एक temporary experiment
जो कि हो गया permanent
अगर वह पुड़ी खुल गई काली
तो फिर नहीं बचेगी तेरे गालों की लाली
न नीली, न पीली, न हरी सिर्फ़ काली
ये पूरी दुनिया हो जाएगी काली
बोला उल्लू, अबे कल्लू, तूने ऐसा किया क्यूँ?
हरी, पीली, लाल, नीली, रंग-बिरंगी ये दुनिया
भाती नहीं तुझे क्यूँ ?
हाँ मैंने ऐसा किया सुन बे उल्लू
क्यूंकि सब चिड़ाते है मुझे कल्लू
अब दिन के चार पहर हो या रात के पहर
नहीं रहा इनमें कोई भी अंतर
क्यूंकि हर जगह छा गया Black Ink का कहर
मटर के अंदर चमगादड़ का घर
जिसको खा गया एक कबूतर
साथ में लगाकर Double Cheese & Butter..!
Wednesday, 5 October 2016
Saturday, 24 September 2016
फाँस
आज फिर.. अतीत ने मेरा हाथ पकड़ मुझे पीछे खी़ंच लिया..
तो झटके से दूसरे हाथों में थमा भविष्य का गुलदस्ता_
नीचे गिर चकनाचूर हो गया..!
जब छुड़ाने लगी खु़द को
अतीत की जकड़न से..
तब गुलदस्ते का एक टुकड़ा
पैरों में चुभ गया..
दोनों ही जख्म़ अब दर्द बराबर देते है..
दिखते नहीं है आँखों से
मगर इनकी चुभन से
आँसू भी रो देते है..!
-निकिता
Sunday, 11 September 2016
Tuesday, 30 August 2016
Monday, 29 August 2016
Monday, 16 May 2016
Monday, 25 April 2016
Tuesday, 19 April 2016
Monday, 22 February 2016
मेरे जीवन का सारांश
बरस-दर-बरस उम्र कटती गई_
वक्त की रेत हथेलियों से फिसलती गई_ _
ना किसी के हो सके
ना किसी को अपना बना सके
जिन्दगी दूर से ही गुजरती गई_
तन्हाईयों के इस शोर में_
ढूँढते - ढूँढते आवाज किसी अपने की
अपनी ही आवाज कहीं गुम हो गई_
हम इस कदर दूर भाग आए
संघर्ष की आग से_
कि सारे तजुर्बों की सिकाई कच्ची ही रह गई_
बरस-दर-बरस उम्र कटती गई_
वक्त की रेत हथेलियों से फिसलती गई_
Wednesday, 17 February 2016
Tuesday, 12 January 2016
जड़-जीवन
एक बीज़ ज़मीन पर गिरा। मृदा नम थी, वह उसके अंदर जा धँस गया। गीली मिट्टी के कारण वह पूर्णतः भीग गया, उसके रोम-रोम में अंतर तक जल समां गया। वह प्रसन्नता और आनंद से फूला नहीं समां रहा था। कुछ दिवस पश्चात उसके अंतर से दो नन्हें अंकुर फूटे। वह शायद पहला और अंतिम दिन था, जब उन दोनों ने एक-दूसरे के स्पर्श से परस्पर एक-दूसरे को जाना पहचाना था।
शनैः-शनैः वे दोनों अपने विकास की ओर अग्रसर होने लगे। एक तेज़ी से ऊपर की ओर जाने लगा और भूमि से बाहर निकल विराट गगन को छूने की कोशिश करने लगा, तो दूसरा मृदा में अंदर नीचे की ओर बढ़ने लगा, और अपने साथी की उसके गगनचुम्बी स्वप्न को पूरा करने में मदद करने लगा।
अपने साथी को सहारा देने एवं उसके विकास तथा पोषण के लिए वह ज़मीन के अंदर ही प्रसन्नचित्त होकर अपना विकास करने लगा। उसमें आकाश को छूने की चाहत कभी नहीं थी, उसे मृदा के मध्य रहना ही पसंद था, जिसे वह अपनी माँ स्वरुप देखता था। जिसके कोमल स्पर्श से उसे अभूतपूर्व आनंद की अनुभूति होती थी। शायद इस कारण भी वह सदैव भूमि से जुड़ा रहा।
भूमि के अंदर रहने के कारणवश वह कभी अपनी आँखें नहीं खोल पाया। किन्तु स्पर्श के जिस अहसास से उसने अपने जीवन को ज़िया, वह अद्वितीय है। मिट्टी में उसने अपनी जिन शाखाओं को विकसित किया, वे जब आपस में गुथती, फैलती, परस्पर व उनके आसपास रहने वाले कीड़ों, जीवों आदि के साथ मस्ती करती, तो उसका संपूर्ण अंतर्मन प्रफुल्लित हो उठता। वे कीड़े जब उन्हें गुदगुदी करते, तो जैसे उनके रोम-रोम में तरंगें उठ जाती। जब कभी मृदा में बनी किसी दरार से हल्का सा प्रकाश उन पर आ गिरता तो उनकी आँखें चौंधियां जाती। अंदर शीतल जल में नम रहती किन्तु यदि जब कभी शीतल समीर उनके अंगों को छूकर गुजरती, तो उनका अंग-प्रत्यंग काँप उठता।
उन्हें दुनिया की कोई चिंता ही नहीं थी। जो जीवन उन्हें मिला था, उसका वे बड़े उत्साह एवं आनंद से निर्वहन कर रही थी। केवल इतना नहीं, इसके साथ-साथ उन्होंने एक नन्हे अंकुर को पोषण देकर फूलों-फलों से हरे-भरे सौंदर्यपूर्ण विशाल वृक्ष में रूपांतरित भी कर दिया था। एक सीमित सीमा में रहकर प्रफुल्लित मन से जानें कितनें ही जीवों का जीवन पल्लवित कर जिस जीवन-उत्साह के साथ वे जी रही है उसका इस सम्पूर्ण संसार में कोई सानी नहीं है।
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